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144 / हीर / वारिस शाह

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कुड़ियां सद के पैचों ने पुछ कीती लंगा कासनूं ढाह के मारया जे
बाझ ऐवें तकसीर[1] गुनाह लुटया इके कोई गुनाह नितारया जे
हाल हाल करदा परे विच बैठा एडा कहर ते खून गुजारया जे
झुगी साड़ के मार के भन्न भांडे एस फकर नूं मार उजाड़या जे
कहो कौन तकसीर फकीर अंदर फड़े चोर वांगूं ढांह मारया जे
वारस शाह मियां पुछे छोहरियां नूं अग लाए फकीर कयों साड़या जे

शब्दार्थ
  1. कसूर