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169 / हीर / वारिस शाह

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आखो रांझे देनाल वयाह देवां इके बनड़े चा मंगाईए जी
हथी आपणी किते समान कीजे जान बुझ के लीक ना लाईए जी
भाइयां आखया चूचका एस मसलत[1] असीं आखदे ना शरमाईए जी
साडा आखया जे कर मन्न लयें असीं खोहल के चाए सुनाईए जी
वारस शाह फकीर प्रेम शाही हीर उस तों पुछ मंगाइए जी

शब्दार्थ
  1. भलाई