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16 दिसम्बर (एक मनहूस दिन के नाम एक कविता) / रश्मि भारद्वाज

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पेशावर और निर्भया के हादसों पर लिखी गई कविता। दुर्भाग्यवश ये दोनों घटनाएँ अलग-अलग वर्षों में 16 दिसम्बर को ही घटी थीं।

कुछ दिन और रातें बहुत सर्द होती हैं
इतनी कि निष्पन्द हो जाता है शरीर
सुन्न हो जाती है उँगलियाँ, और शरीर बर्फ़-सा ठण्डा
और ऐसे ही समय में शायद
कुछ लोग खो बैठते हैं अपनी आत्मा की ऊष्मा भी
मुर्दा हो जाता है उनका अन्तर्मन
उसे ज़िन्दा करने के लिए
वह बटोरते हैं गर्मी मासूमों के ताज़ा खून से
या कि किसी औरत के नरम गोश्त से
और कहीं कुछ भी नहीं बदलता
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती रहती है
आसमान बदस्तूर रहता है अपनी जगह
और हम भी कायम रहते हैं वहीं, जहाँ अब तक बने हुए थे
यह सोचते हुए कि पिछली बार किस बुरे वक़्त पर आसमान की ओर तकते हुए कहा था
कि मालिक अब तो रहम कर,
कि तेरी इस क़ायनात में इससे ग़लत भी कुछ हो सकता है
 
और ऐसे वक़्त में शायद
वह भी अपनी आत्मा को ज़िन्दा रखने के लिए
कहीं छुपा थोड़ी-सी गर्माहट तलाश रहा होता है
वह, जिसे हम ईश्वर और तुम ख़ुदा बुलाते हो
आओ, कि आज उसकी लिखी ताबीरों का अलाव जलाते हैं
और उसकी गर्मी से ज़िन्दा करते हैं, मुर्दा हो रही इंसानियत को