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216 / हीर / वारिस शाह

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तैनूं हाल दी गल मैं लिख घलां तुरत हो फकीर तै आवना ईं
किसे जोगी दा जा के बनी चेला सवाह लाके कन पड़वावना[1] ईं
सभो जात सफात बरबाद करके अते ठीक तैं सीस मुणावना ईं
तू ही जीउंदियां दईं दीदार सानूं असां वत न जीउंदियां आवना ईं
यारी तोड़ निभावनी दस सानूं वारस एह जहान छड जावना ईं

शब्दार्थ
  1. कान फड़वाना