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218 / हीर / वारिस शाह

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पैचां पिंड दयां सच तों तरक कीती काज़ी रिशवतां मारके चोर कीते
पहले होरनां नाल करार करके तम्हा वेख दामाद चा होर कीते
गल करे ईमान दी कढ छडनपैंच पिंड दे ठग ते चोर कीते
अशराफ[1] दी बात मनजूर नाहीं चोर चैधरी अते लंडोर कीते
कां बाग दे विच कलोल करदे कूड़ा फोलने दे उते मोर कीते

शब्दार्थ
  1. शरीफ लोग, कुलीन