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222 / हीर / वारिस शाह

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घर खेड़यां दे जदों हीर गई चुक गए तगादड़े[1] अते झेरे
विच सयालां दे वी चुप चां होई अते खुशी हो फिरदे ने सब खेड़े
फौजदार तगयार[2] हो आन बैठा कोई रांझे दे पास ना पाए फेरे
विच तखत हजारे दे होण गलां रत्न भाबियां रांझे दियां करन झेरे
चिठी लिखके हीर दी उजरखाही[3] जिवें बोले नूं पुछीए हो नेरे
होई लिखी रजाय[4] रंझेटया वे साडे अलढ़े घाह ने तूं उचेड़े
मुड़ आ ना विगड़या कम तेरा लटकंदड़ा[5] घरी तूं पा फेरे
जेहड़े फुल दा नित तूं रवें राखा उस फुल नूं तोड़ लै गये खेड़े
जिस वासते फिरें तूं विच झलां जिथे बाघ बघेले ते शींह पेड़े
कोई नहीं वसाह कुवारियां दा ऐवें लोक नकमड़े करन झेड़े
तूं तां मेहनतां सैं दिन रात करदा वेखो कुदरतां रब्ब दियां कौन करे
ओस जूह न हिरनीयां पीन पानी घुस जान जित्थे मूंह हनेरे हेड़े[6]
वारस शाह एह नजर सी असां मंनी खुवाजा खिजर चराग दे लये फेरे

शब्दार्थ
  1. झगड़े
  2. तब्दील हो के
  3. क्षमा चाहने वाला
  4. भगवान की मर्जी
  5. बेमतलब
  6. शिकारी