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227 / हीर / वारिस शाह

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हथ बन्न के गल विच पा पला कहीं उसनूं दुआ सलाम मेरा
मैंनूं बैरियां ते बस पाईयो ने सांइयां चा विसारया नाम मरो
माझू वाह[1] विच बोढ़िए मापयां ने उन्हां नाल नाहीं कोई काम मेरा
हथ जोड़ के रांझे दे पैर पकड़ी इक एतना कहि पैगाम मेरा
वारस नाल बे वारसां रहम कीजे मेहरबान होके आयो शाम मेरा

शब्दार्थ
  1. नदी-नाला