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234 / हीर / वारिस शाह

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दिती हीर लिखाइके एह चिठी पीए रांझे दे हथ लै जा देनी
किते बैठ नवेकले सद मुलां सारी खोलके बात सुना देनी
हथ बन्न के मेरयां सजनां नूं रो रो के सलाम दुआ देनी
मर चुकी आं जान है नक उते इकवार प्यारे दीद[1] आ देनी
खेड़ा हथ ना लांवदा मंजड़े नूं हथ लाइके गोर विच पा देनी
कख हो रहियां गमां नाल रांझा इक चिनग लजाके ला देनी
मेरा यार है तां मैंथों पहुंच रांझा कन्नीं मिएं दे एतनी पा देनी
मेरी लईं निशानड़ी बाक छल्ला रांझे यार दे हथ फड़ा देनी
वारस शाह मियां उस कमलड़े नूं धुणख[2] जुलफ जजीर दी पा देनी

शब्दार्थ
  1. दर्शन
  2. ढंग