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256 / हीर / वारिस शाह

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गैबत[1] करन बेगानड़ी अत औगन सते आदमी एह गुनाहगार हुंदे
चोर चुगल किरतघन ते झूठ बोले लूती लांवदे सतवां यार हुंदे
असां जोग नूं नहीं गल पहन बहना तुसी कासनूं ऐडे बेजार हुंदे
वारस जिन्हां उमैद ना तांघ काई कम्म तिन्हां दे आकबत[2] पार हुंदे

शब्दार्थ
  1. निंदा
  2. आखिर को