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266 / हीर / वारिस शाह

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साबत हुंदी लंगोटी जे सुनीं नाथा काहे झगड़ा चा उजाड़दा मैं
जीभ इशक थीं चुप जे रहे मेरी ऐडे पाड़ने कास नूं पाड़दा मैं
इस जिऊ नूं नढी ने मोह लया नित फकर दा नाम चितार दार मैं
जिऊ मार के रहन जे होवे मेरा ऐडे मामले कासनूं धारदा मैं
जे मैं मसत उजाड़ विच जा बैंहदा महीं सयाल दियां कासनूं चारदा मैं
सिर रोड करा क्यों कन्न पाटन जेकर किबर[1] हंकार नूं मारदा मैं
जे मैं जानदा कन्न तूं पाड़ देने इह मुंदरां मूल ना धारदा मैं
जे मैं जानदा इशक थीं मना करना तेरे टिले ते धार ना मारदा मैं
इके कन्न सवार दे फेर मेरे नहीं घतूंगु धौंस सरकार दा मैं
होर कम नहीं सी फिकर होवने दा इक वारस रखदा हां गम यार दा मैं

शब्दार्थ
  1. घमंड