भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

26 जनवरी के प्रति / विमल राजस्थानी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जब न आयी थी तुम हम बहुत शाद थे
बात यह थी अलग हम न आज़ाद थे

(1)
हमने खायी बहुत घास की रोटियाँ
भाल हरदम तना का तना ही रहा
किन्तु पाकर तुम्हें चाँदनी कब मिली
जिन्दगी में अँधेरा बना ही रहा

(2)
जब न आजाद थे, हम बहुत शाद थे
इस कदर तो न हम हाय ! बर्बाद थे
था परायों ने लूटा, सही बात है
किन्तु अपने थे अपने, न जल्लाद थे

(3)
शान्ति से था हमारा चमन लुट रहा
अब भी लुटता है लेकिन है दम घुट रहा
राष्ट्र से भी बड़ा बन गया आदमी
जन्म लेता नहीं है नया आदमी

(4)
‘डालडा’ का अता औ’ पता भी न था
जो भी था शुद्ध था और रंगीन था
खुशबू उड़ती थी हलवे की चारो तरफ
दिल नरम थे, दिमागों पै ठंडी बरफ

(5)
आज खाने में थोड़ी भी लज्जत नहीं
है शरीफों की थोड़ी भी इज्जत नहीं
इक्के वाले अदब साथ में ले गये
ग्रेजुएटों को बेअदबियाँ दे गये

(6)
चोर-डाकू-उचक्कों का जमघट न था
पेट में चाकू घुसने का संकट न था
अब तो जूतों की भी खैरियत है नहीं
भोंड़ी बातों से है बोरियत सब कहीं

(7)
साथ में हो बहन या तरूण लाडली
लोग चिल्लायेगे-‘‘छोकरी फाँस ली’’
खुद जो गैरों के घर करते सेजें गरम
मंच पर झाड़ते नीतियाँ औ’ धरम

(8)
एल0टी0आई0 मिनिस्टर बने रहनुमाँ
आज चारो तरफ उल्लुओं का समाँ
गाँव से दिल्ली तक लूट ही लूट है
दफ्न मिल्लत हुई, फूट ही फूट है

(9)
दाम चीजों के अल्लाह ! तारौं पे हैं
खुद भँवर में औ’ नांव किनारों पे हैं
दिल-दिमागों के पारे सितारों पे हैं
तख्त औ’ ताज लट्टू गँवारों पे हैं

(10)
घूस लेते हुए पकड़े गर जाइए
घूस देकर के फौरन ही बच जाइए
खून करना किसी का हँसी खेल है
साधुओं के लिए जेल है, सेल है

(11)
लाख पुतलें जलें, लाख भाषण चलें
लाख शापों के चाहे हिमालय ढलें
पाप के साँढ़ की गति बहुत तेज है
दुम छड़ी-सी खड़ी, आँख खूँरेज है

(12)
‘लाल कपड़ा’ इसे और भड़कायेगा
देश ‘स्पेन’ हरगिज बन पायेगा
धुल न पायेगी यों ही घनी कालिमा
‘‘भोर लायेगी केवल लहू-लालिमा’’
(13)
यह प्रजातंत्र है या कि धोखाधड़ी ?
टूटती ही नहीं आँसुओं की लड़ी
यह निकम्मी प्रगति मात्र उनके लिए
जल रहे, जिनके महलों में घी के दीये

(14)
पाप पनपे जहाँ, न्याय बिकने लगे
सत्य फुटपाथ पर गिर सिसकने लगे
ठोकरों में पड़ा दीनो-ईमान हो
मात्र पैसा ही जिस घर का भगवान हो

(15)
उन घरों को मशालों की लौ चाहिए
तीखे तेवर, खिंची उनकी भौं चाहिए
मुक्ति लाये जो उनका न नामो निशाँ
बस उचक्कों की जय से निनादित दिशा

(16)
ये ‘गरीबी हटाओ’ का नारा न दो
रेत की मछलियों को ये चारा न दो
खुद सँभल जायेंगे लड़खड़ाते कदम
रक्त-रंजित करों का सहारा न दो

(17)
जो जगी आग उसको हवा चाहिए
मौत को जिन्दगी की दवा चाहिए
खौलता खून रग में, रवाँ चाहिए
सिर पर बाँधे कफन कारवाँ चाहिए

(18)
चाहिए रक्त-रंजित धरा देश को
शोषकों-पापियों का दमन चाहिए
जर्रा-जर्रा निछावर वतन के लिए
हमकों फूलों से लक-दक चमन चाहिए