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271 / हीर / वारिस शाह

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नाथ मीट अखीं दरगाह अंदर नाले अरज करदा नाले संगदा ए
दरगाह लोबाली[1] है हक वाली ओथे आदमी बोल ना हगदा ए
आसमान जमीन दा वामसी तूं तेरा वडा पसारड़ा रग दा ए
रांझा जट फकीर हो आन बैठा रख तकवा नाम ते लंग दा ए
सभ छड बुरयाइयां बन्न तकवा लाह आसरा साक ते अंग दा ए
ऐसा इशक ने मार हैरान कीता सड़ गया सू अंग पतंग दा ए

शब्दार्थ
  1. लापरवाह