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278 / हीर / वारिस शाह

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जदों रंग पुर दी जूह जा वड़या भेडां चारे अयाल[1] विच बार दे जी
नेड़े आनके जोगी नूं वेखदा ए जिवें नैन वेखन नैन यार दे जी
झस[2] चोर ते चुगल दी जीभ वांगूं गुझे रहन ना दीदड़े यार दे जी
चोर यार ते ठगना रहन गुझे किथों छुपन एह आदमी कार दे जी
तुसीं केहड़े देस तों आए रमते सुखन दस खं खोल नरवार दे जी
हमीं लंक-बासी चेले अगस्त मुनि दे हमीं पंछी समुंदरों पार दे जी
वारस शाह मियां चारे चक भौंदे हमीं कुदरतां नूं दीद[3] मारदे जी

शब्दार्थ
  1. आजड़ी
  2. बुरी आदत
  3. दर्शन