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61/ हरीश भादानी

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वर्षों से बीमार दर्द
अब किसी तरह मर जाये तो अच्छा है।
यह दर्द-
जिसे मन के कमजोर लोग
रख गये हमारे द्वार
यह दर्द-
प्यार के यहूदियों की लावारिस सन्तान
जो हमको बड़ी हवेली वाला समझ
किया चाहते होंगे व्यापार,
यह दर्द-
हमारा अनचाहा महमान कि-
जिसकी खातिर हमने
नंगी छतवाले जीवन के घर का
चूना-ईंट कुरेदी,
जगह-जगह कर दिये झरोखे,
बेच दिया सब कुछ
केवल ईमान छोड़ कर;
क्या मालूम प्यार-खोरों को
जीवन क्या होता है?
जिजीविषा कैसी होती है?
यह दर्द-
किसी पांचाली जैसा
सिर्फ सुखों के लिये न चीखे तो अच्छा है,
हमें, हमारे
नंगेपन के लिये न टीसे तो अच्छा है,
यह दर्द-
धूप खाये, हम जैसी प्यास पिये
हम-दम कहलाये तो अच्छा है,
अन्यथा हमें डर है कि-
अनागत जीवन के ये दावेदार-
हमारे सांसों के टहलुए
कहीं ईमान बेचने की सीमा तक
आते आते
अनचाहे मेहमान दर्द को जहर पिलादें
और हमारे
अंगारों की आँच उजाले हुए इरादे
एक अपाहिज की हत्या के दायी हो जाय,
किसी तरह यह दर्द-
स्वयं की मौत बुला मर जाये तो अच्छा है !