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61 से 70 तक / तुलसीदास / पृष्ठ 1

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पद संख्या 61 तथा 62

(61),
देव-
 सकल सुखकंद, आनंदवन -पुण्यकृत, बिंदुमाधव द्वंद्व- विपतिहारी।
 यस्यांघ्रिपाथोज अज -शंभु -सनकादि-शुक-शेष -मुनिवृंद-अलि-निलयकारी।1।

अमल मरकत श्याम, काम शतकोटि छावि, पीतपट तड़ित इव जलदनीलं।
 अरूण शतपत्र लोचन, विलोकनि चारू,प्राणतजन-सुखद,करूणाद्र्शीलं।2।

 काल-गजराज-मृगराज, दनुजेश-वन -दहक पावक, मोह-निशि-दिनेशं।
चारिभुज चक्र -कौमिदकी-जलज-दर,सरसिजापरि यथा रजहंसं।3।

 मुकुट,कुंडल, तिलक,अलक अलिव्राइतव, भृकुटि,द्विज, अधरवर,चारूनासा।
 रूचिर सुकोल,दर ग्रीव सुखसीव, हरि इंदुकर कुंदमिव मधुरहासा।4।

उरसि वनमाल सुविशाल नवमंजरी, भ्राज श्रीवत्स-लांछन उदारं।
 परम ब्रह्मन्य , अतिधन्य, गतमन्तु,अज, अमितबल, बिपुल महिमा अपारं।5।

हार-केयूर, कर कनक कंकन रतन-जटित मणि -मेखला कटिप्रदेशं।
युगल पद नूपुरामुखर कलहंसवत, सुभग सर्वांग सौंदर्य वेशं।6।

सकल सौभाग्य-संयुक्त त्रैलोक्य-श्री दक्षि दिशि रूचिर वारीश-कन्या।
 बसत विबुधावगा निकट तट सदनवर, नयन निरखंति नर तेऽति धन्या।7।

अखिल मंगल भवन, निबिड़ संशय -शमन दमन-वृजिनाटवी, कष्टहर्ता।
विश्वधृत,विश्वहित, अजित,गोतीत, शिव, विश्वपालन, हरण, विश्वकर्ता।8।

ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्य-निधि, सिद्धि अणिमादि दे भूरिदानं।
ग्रसित-भव-व्याल अतित्रास तुलसिदास,त्राहि श्रीराम उरगारि-यानं।9।

(62),
इहै परम फलु परम बड़ाई।
 नखसिख रूचिर बिंदुमधव छबि निरखहिं नयन अघाई। 1।

बिसद किसोर पीन सुंदर बपु, श्याम सुरूचि अधिकाई।
नीलकंज, बारिद, तमाल, मनि , इन्ह तनुते दुति पाई।2।

मृदुल चरन शुभ चिन्ह , पदज, नख अति अभूत उपमाई।
अरून नील पाथोज प्रसव जनु, मनिजुत दल-समुदाई।3।

जातरूपम नि-जटित-मनोहर,नूपुर जन-सुखदाई।
जनु हर-उर हरि बिबिध रूप धरि, रहे बर भवन बनाई।4।

कटि तट रटति चारू किंकिनि-रव, अनुपम , बरनि न जाई।
 हेम जलज कल कलित मध्य जनु, मधुकर मुखर सुहाई।5।

उर बिसाल भृगुचरन चारू अति, सूचत कोमलताई।
कंकन चारू बिबिध भूषन बिधि, रचि निज कर मन लाई।6।

गज-मनिमाल बीच भ्राजत कहि जाति न पदक निकाई।
जनु उड्डगन-मंडल बरिदपर, नवग्रह रची अथाई।7।

भुजगभोग-भुजदंड कंज दर चक्र गदा बनि आई ।
 सेाभासीव ग्रीव , चिबुकाधर, बदन अमित छबि छाई।8।

 कुलिस, कुंद कुडमल, दामिनि-दुति, दसनन देखि लजाई।
नासा - नसन -कपोल, ललित श्रुति कुंडल भ्रू मोहि भाई।9।

कुंचित कच सिर मुकुट,भाल पर, तिलक कहौं समुझाई।
 अलम तड़ित जुग रेख इंदु महँ, रहि तजि चंचलताई।10।

निरमल पीत दुकूल अनूपम ,उपमा हिय न समाई।
बहु मनिजुत गिरि नील सिखपर कनक-बसन रूचिराई।11।

 दच्छ भाग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई।
हेमलता जनु तरू तमाल ढिग, नील निचोल ओढ़ाई।12।

सत सारदा सेष श्रुति मिलिकै, सोभा कहि न सिराई।
तुलसिदास मतिमंद द्वंदरत कहै कौन बिधि गाई।13।