भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
"फिर उसी राहगुज़र पर शायद / फ़राज़" के अवतरणों में अंतर
Kavita Kosh से
पंक्ति 24: | पंक्ति 24: | ||
फिर भी तू इन्तज़ार कर शायद | फिर भी तू इन्तज़ार कर शायद | ||
</poem> | </poem> | ||
− | {{KKMeaning} | + | {{KKMeaning}} |
08:04, 18 अगस्त 2011 का अवतरण
फिर उसी रहगुज़र पर शायद
हम कभी मिल सकें मगर शायद
जान पहचान से ही क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त ग़ौर कर शायद
जिन के हम मुन्तज़िर<ref>प्रतीक्षारत</ref> रहे उनको
मिल गये और हमसफ़र शायद
अजनबीयत की धुंध छंट जाए
चमक उठे तेरी नज़र शायद
जिंदगी भर लहू रुलाएगी
यादे -याराने-बेख़बर<ref> भूले बिसरे दोस्तों की यादें</ref> शायद
जो भी बिछड़े हैं कब मिले हैं "फ़राज़"
फिर भी तू इन्तज़ार कर शायद
शब्दार्थ
<references/>