भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"वो जाने कितना सर-ए-बज़्म शर्म-सार हुआ / 'फना' निज़ामी कानपुरी" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार='फना' निज़ामी कानपुरी }} {{KKCatGhazal}} <poem> व...' के साथ नया पन्ना बनाया)
 
(कोई अंतर नहीं)

09:00, 26 अगस्त 2013 के समय का अवतरण

वो जाने कितना सर-ए-बज़्म शर्म-सार हुआ
सुना के अपनी ग़ज़ल मैं क़ुसूर-वार हुआ

हज़ार बार वो गुज़रा है बे-नियाज़ाना
न जाने क्यूँ मुझे अब के ही ना-गवार हुआ

हज़ारों हाथ मेरी सम्त एक साथ उठे
मगर मैं एक ही पत्थर में संग-सार हुआ

मैं तेरी याद में गुम था की खा गया ठोकर
ये हादसा मेरी राहों में बार बार हुआ