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<poem>आइ वातावरणमे अछि तप्त युग केर तापयुगकेरताप,
भैरवी झंझाक गतिमे झरत जगतक पाप।
तार स्वप्नक टूटते जागरण भैरव गीत,
वर्तमानक वर्त्तमानक चरण-घातें घातेँ चूर्ण पतित अतीत। कोनहु कोनहिमे मलिन अछि जकर क्षीणालोक,
जे न जगबय ज्वाल उर, ने हरय तिमिरक शोक।
क्षणिक दीपक मृŸिाकाक मृत्तिकाक न आइ बचत इजोत,भैरवी झंझाक झोंकक कतहु अछि न इरोतइरोत।
आइ जन-जनमे न भ्रम हो कतहु मुक्ता-सीप,
द्वीप-द्वीपक तिमिरहारी उगओ गगनक दीप।
आइ केशव-ग्रीवमे नहि छजत गुआमालगुजामाल,
सिन्धु मथि प्रस्तुत जखन अछि कौस्तुभक मणिमाल।
विद्युतक ई क्षणिक विलसित बन्द युग-युग हेतु,
महा पवनक वेग चालित भिन्न मेघक सेतु।
इन्द्रधनु नवरंग रंजित स्वयं लोपित क्षुद्र,
कैल ज्या योजित अपन पिनाक जखनहि रूद।रुद्र।
नहि पिपासित भूतलक हित लघु जलक ई कूप,
उमड़ि आएल आयल गगन-तटमे जखन मेघ-स्तुप।स्तूप। आइ नहि नूपुरक रूनझुनरुनझुन, वेणवेणु-वीणा-शब्द,
गगनमे गर्जल जखन गम्भीर स्वरमे अब्द।
कामिनिकामिनी-यौवन न पार्थक रूचिरुचि-विलासक वस्तु,
पाशुपत पूजित जकर शुचि लक्ष्य तपसँ अस्तु।
घिचत कृष्णा-क्षीर वीर दुःशासनक नहि से शक्ति,
चढ़ल कृष्णक अंगुलिक ब्रण-बद्ध वस्त्रक भक्ति।
स्वर्ण वन-उद्यान उजड़त मरूतमरुत-सुतहिक हाथ,कनक-मृग छल हरल जे खल खत मैथिली दशमाथ। नहि निशनिशा-पट तिमिर क्षालित क्षलित नखत फेनक बिन्दु,किरणमाली उदित होइछ पूर्ण राका-इन्दु। मास मधु की लए लय मनाओत दग्ध उर-उद्यान,विषुव-रेखा टपि उगल छथि भानु दिग् ईशान।
मेघमाला सजल झरते गलित नीरक गर्व,
देखु, गगनक फाँकसँ हँसि रहल शारद पर्व।
क्षीण आशावरी-स्वर जत भैरवी झंकार,
किन्तु नहि संहार ई, नव सृष्टिहिक उपहार।
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