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"सड़क की छाती पर चिपकी ज़िन्दगी १४ / शैलजा पाठक" के अवतरणों में अंतर

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15:19, 21 दिसम्बर 2015 के समय का अवतरण

जब हम कॉफी ख़त्म होने पर झल्ला रहे थे
विदर्भ की धरती का रंग गहरा कत्थई हो गया था

दरारों को किसान की आंखों की रेत पाट रही थी
एक खाली थाली में खाना नहीं...एक पेड़ दिखता है
जिसकी डोर से लटकी एक बेबस भूख
फटी आंखें पीछे छूटे अपनों से माफी रही थी
एक बादल उनकी पलकों में बंद मर गया
एक नदी उसके आंख के कोर पर सूखी

विधवा औरतों ने बच्चों के हिस्से की रोटी
धधकती आग में जला दी है
ये अपने हिस्से का बादल बनाने की कोशिश में है
एक ठठरी बच्चे के गोल कटोरे में
धरती खुदकुशी करती है

ऐसे विकट समय में मैं प्रेम में हूं
तुम्हारी हथेलियां चूमना चाहती हूं
धरती की दरकी दरारें हैं तुम्हारी हथेली
पेड़ के गिर्द लिपटी मन्नतों के
धागों से तुम रस्सियां बंट रहे हो
मैं डर रही हूं...सब खैरियत तो है!

अजीबोगरीब ख्यालों से बुनती हूं दिन
थपकियों में दरारों वाली धरती है कि तुम्हारी हथेली
बादल सिरहाने ही रहे सारी रात।