"सौदागर का मैना लाना / प्रेम प्रगास / धरनीदास" के अवतरणों में अंतर
Sharda suman (चर्चा | योगदान) |
Sharda suman (चर्चा | योगदान) |
||
पंक्ति 2: | पंक्ति 2: | ||
{{KKRachna | {{KKRachna | ||
|रचनाकार=धरनीदास | |रचनाकार=धरनीदास | ||
− | |अनुवादक= | + | |अनुवादक= |
− | |संग्रह= | + | |संग्रह=प्रेम प्रकाश / धरनीदास |
}} | }} | ||
<poem> | <poem> |
09:35, 19 जुलाई 2016 के समय का अवतरण
चौपाई:-
एक दिवस सो बैठ अथाऊ। सौदागर एक अमरे आऊ।।
जय मिलाय कुंअर से कियऊ। मैना एक अपूरब दिखाऊ।।
पुनि मैना-गुण कहवै लीना। बहू विद्या विधिना तेंहि दीना।।
अवर कहां लौ कहौ सुभाऊ। येहि सम पंडित कंचित काऊ।।
जो एक पंडित और बौलाऊ। प्रगट होय येहिकर सुधराऊ।।
विश्राम:-
कुंअर सुनत चित हर्षित, पंडितराज बुलाय।
द्विज मैनहि भौ सरबरी, नहि पंडित ठहराय।।10।।
चौपाई:-
राजकुंअर पंखीगुन चीन्हा। लेकर कुंअर बहुत हित कीन्हा।।
सौदागर सो विनती लाई। जो मन भावै कहौ गोसांई।।
देंउ तुरत लावों नहि वारा। जो मन इच्छा होय तुम्हारा।।
साहु कहै सुनु राजकुमारा। वरद लाख एक लादयों मारा।।
तेहि कारन मैं गोचर लाओं। सबकर दाम दान करि पाओ।।
विश्राम:-
कुंअर सुनत किहु आज्ञा, कंठमाल पहिराव।
हरखित साहु सिधारेऊ। धरनी जन गुन गाव।।11।।