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"हसीं हो यार इतना ही नहीं वो बावफ़ा भी हो / डी. एम. मिश्र" के अवतरणों में अंतर

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कि जिसमें तेल बाती ही नहीं हो, हौसला भी हो
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किसी के सामने क्यों दीन बनकर हाथ फैलाते
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खुदा से सिर्फ़ माँगो गर तुम्हें कुछ माँगना भी हो
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महज़ पाँवों के होने से सफ़र पूरा नहीं होता
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सफ़र के वास्ते इक साफ़ -सुथरा रास्ता भी हो
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उसी को मानिए अपना जो सुख- दुख बाँटता भी हो
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करें इंसाफ़ जज साहब मगर इतनी गुज़ारिश है
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जो जनहित में भी हो लेकिन वो ऐसा फ़ैसला भी हो
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उसी फ़नकार को दुनिया अदब से याद रखती है
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अलग अंदाज़ हो जिसका , अलग सा दीखता भी हो
 
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15:34, 22 मार्च 2025 के समय का अवतरण

हसीं हो यार इतना ही नहीं वो बावफ़ा भी हो
समझदारी भी हो उसमें,वो थोड़ा बावला भी हो

तभी हम मान सकते हैं कि वो इंसान सच्चा है
ग़लत को जब ग़लत कहने की उसमें माद्दा भी हो

वही दीया सुबह तक डेहरी पर टिमटिमाता है
कि जिसमें तेल बाती ही नहीं हो, हौसला भी हो

किसी के सामने क्यों दीन बनकर हाथ फैलाते
खुदा से सिर्फ़ माँगो गर तुम्हें कुछ माँगना भी हो

महज़ पाँवों के होने से सफ़र पूरा नहीं होता
सफ़र के वास्ते इक साफ़ -सुथरा रास्ता भी हो

बंधे रिश्तों की डोरी में बहुत से लोग हैं लेकिन
उसी को मानिए अपना जो सुख- दुख बाँटता भी हो

करें इंसाफ़ जज साहब मगर इतनी गुज़ारिश है
जो जनहित में भी हो लेकिन वो ऐसा फ़ैसला भी हो

उसी फ़नकार को दुनिया अदब से याद रखती है
अलग अंदाज़ हो जिसका , अलग सा दीखता भी हो