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11:49, 4 जून 2009 का अवतरण
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दुख
गठरी मेंढ़कों की
गाँठ खोलता हूँ
तो उछ्लते-कूदते बिखर जाते हैं
घर के चारों तरफ़
हर रोज़
एक नई गाँठ लगाता हूँ
इस गठरी में
कला यही है मेरी
दिखने नहीं दूँ
सिर पर उठाई गठरी यह
बच्चों को।
मूल पंजाबी से अनुवाद : सुभाष नीरव