भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"शरण में जन, जननि / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
 
छो
पंक्ति 5: पंक्ति 5:
 
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
 
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*
  
<PRE>
+
अनगिनित आ गये शरण में जन, जननि-<br>
अनगिनित आ गये शरण में जन, जननि-
+
सुरभि-सुमनावली खुली, मधुऋतु अवनि!<br>
सुरभि-सुमनावली खुली, मधुऋतु अवनि!
+
स्नेह से पंक - उर हुए पंकज मधुर,<br>
स्नेह से पंक - उर हुए पंकज मधुर,
+
ऊर्ध्व - दृग गगन में देखते मुक्ति-मणि!<br>
ऊर्ध्व - दृग गगन में देखते मुक्ति-मणि!
+
बीत रे गयी निशि, देश लख हँसी दिशि,<br>
बीत रे गयी निशि, देश लख हँसी दिशि,
+
अखिल के कण्ठ की उठी आनन्द-ध्वनि।<br>
अखिल के कण्ठ की उठी आनन्द-ध्वनि।
+
</PRE>
+

23:04, 28 अक्टूबर 2006 का अवतरण

लेखक: सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*

अनगिनित आ गये शरण में जन, जननि-
सुरभि-सुमनावली खुली, मधुऋतु अवनि!
स्नेह से पंक - उर हुए पंकज मधुर,
ऊर्ध्व - दृग गगन में देखते मुक्ति-मणि!
बीत रे गयी निशि, देश लख हँसी दिशि,
अखिल के कण्ठ की उठी आनन्द-ध्वनि।