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स्वयं विचरते रहे सदा स्वच्छन्द दिशाओं में | स्वयं विचरते रहे सदा स्वच्छन्द दिशाओं में |
19:00, 17 अप्रैल 2008 का अवतरण
स्वयं विचरते रहे सदा स्वच्छन्द दिशाओं में
हम सबको उलझाये रक्खा नीति-कथाओं में।
हर पीढ़ी में छले गये हम
गुरुओं-प्रभुओं से
जीये भी तो इनके ही
खूंटे पर पशुओं से
घुट-घुट कर रह गयी हमारी चीख गुफाओं में
इन्हीं महन्तों-संतों ने
कठघरा बनाया है
पाप-पुण्य औ स्वर्ग-नरक
इनकी ही माया है
अपने रहते प्रावधान से ये धाराओं में।
हम होते हैं हवन
और ये होता होते हैं
कान फूंकते जहां
वहां हम श्रोता होते हैं
जनम-जनम यजमान सरीखे हम अध्यायों में।
जैसे गोरे वैसे काले
कोई फर्क नहीं
सुनते जाओ करते जाओ
तर्क-वितर्क नहीं
कभी नहीं बर्दाश्त इन्हें अपनी सुविधाओं में।