भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
"म्हैं हांसी ही /अंकिता पुरोहित" के अवतरणों में अंतर
Kavita Kosh से
Neeraj Daiya (चर्चा | योगदान) |
Mani Gupta (चर्चा | योगदान) |
||
पंक्ति 4: | पंक्ति 4: | ||
|संग्रह= | |संग्रह= | ||
}} | }} | ||
− | {{KKCatKavita}}<poem>घर सूं गळी | + | {{KKCatKavita}} |
+ | {{KKCatRajasthaniRachna}} | ||
+ | <poem>घर सूं गळी | ||
गळी सूं गांव | गळी सूं गांव | ||
गांव सूं ठाह नीं कठै-कठै | गांव सूं ठाह नीं कठै-कठै |
18:28, 16 अक्टूबर 2013 के समय का अवतरण
घर सूं गळी
गळी सूं गांव
गांव सूं ठाह नीं कठै-कठै
भंवै भाई
सिंझ्या
उण सूं पैली पूगै
गांव रा ओळमा
समूळो घर
ऊभो दीखै भाई साथै
भाई रै कूड़ माथै
न्हाखै धूड़
ओळमा बूरता!
म्हैं हांसी ही गळी में
फगत एक दिन
बांदर-बांदरी रो
खेल देखतां
जा पछै
बंद है
म्हारै घर री
बाखळ रो बारणो
अणमणा है
घर रा सगळा
उण दिन रै पछै!