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मैं बनूँ वह वृक्ष जिसकी स्निग्ध छाया में कभी | मैं बनूँ वह वृक्ष जिसकी स्निग्ध छाया में कभी | ||
− | थे रुके दो तरुण प्रणयी, फिर न रुकने को कभी | + | थे रुके दो तरुण प्रणयी, फिर न रुकने को कभी । |
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मैं बनूँ वह शैल जिसके, दीन मस्तक पर कभी | मैं बनूँ वह शैल जिसके, दीन मस्तक पर कभी | ||
− | थे रुके दो मेघ क्षण भर, फिर न रुकने को कभी | + | थे रुके दो मेघ क्षण भर, फिर न रुकने को कभी । |
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मैं बनूँ वह भग्न-गृह, जिसके निविड़ तम में कभी | मैं बनूँ वह भग्न-गृह, जिसके निविड़ तम में कभी | ||
− | थे जले दो दीप क्षण भर, फिर न जलने को कभी | + | थे जले दो दीप क्षण भर, फिर न जलने को कभी । |
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मंगलों से जो सजा था मधुर गीतों से भरा | मंगलों से जो सजा था मधुर गीतों से भरा | ||
− | मैं बनूँ वह हर्ष, जाता जो न फिरने को कभी | + | मैं बनूँ वह हर्ष, जाता जो न फिरने को कभी । |
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02:52, 23 जनवरी 2011 के समय का अवतरण
मैं बनूँ वह वृक्ष जिसकी स्निग्ध छाया में कभी
थे रुके दो तरुण प्रणयी, फिर न रुकने को कभी ।
मैं बनूँ वह शैल जिसके, दीन मस्तक पर कभी
थे रुके दो मेघ क्षण भर, फिर न रुकने को कभी ।
मैं बनूँ वह भग्न-गृह, जिसके निविड़ तम में कभी
थे जले दो दीप क्षण भर, फिर न जलने को कभी ।
मंगलों से जो सजा था मधुर गीतों से भरा
मैं बनूँ वह हर्ष, जाता जो न फिरने को कभी ।