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रचनाकाल: सन 1930
बताएं तुम्हें हम कि क्या चाहते हैं,
गुलामी से होना रिहा चाहते हैं।
फ़क़त इस ख़ता के सज़ावार हैं हम,
कि दर्दे-वतन की दवा चाहते हैं।
बुरा चाहते हैं जो हम बेकसां का,
हम उनका भी दिल से भला चाहते हैं।
ग़रीबों को तेरा ही बस आसरा है,
निगाहे-करम या ख़ुदा चाहते हैं।
इस उजड़े हुए गुलशने-हिंद को फिर,
हरा और फूला-फला चाहते हैं।
घड़ा पाप का ग़ालिबन भर चुका है,
ज़माने से ज़ालिम मिटा चाहते हैं।
वतन पर दिलो-जान कुर्बान करके,
जो मरकर भी आबे-वफ़ा चाहते हैं।