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मंगल लग्न भवन मंगलमय मंगलमय अवतारा।
रघुवर जन्म उदारा। मंगल सुख सारा॥
देश देश के नृप सब आए बहु विधि लिय उपहारा।
भूलि गई सुधि निजतनु केरी बिसरी विधि व्यवहारा।
जपतप संयम मुनिगण बिसरे योगी योग अचारा।
मगन भये रघुपति यश गावें सब नाचहिँ नृप द्वारा।
सुरगण दुन्दुभि झाल बजावैं सबदिशि जयजयकारा।
सुमन सुमन वर्षै अति हर्षै निरखैँ करहिं विचारा।
गुणनिधान करुणारस पूरण नृपसुत परम उदारा।
‘शिवपूजन’ जन अभय करन को असुर माहि हरिहैँ महिभारा॥
इति