भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

"कुम्भ / पंकज सुबीर" के अवतरणों में अंतर

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=पंकज सुबीर |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatKav...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
 
(कोई अंतर नहीं)

17:10, 30 दिसम्बर 2017 के समय का अवतरण

मैं चाहता था कि कुम्भ पर कुछ लिखूँ
लिखूँ कि किस तरह करोड़ों लोग
एक साथ नहा रहे हैं
जबकि गंगा का पानी तो
पहले जैसा साफ भी नहीं रहा
क्या आवश्यकता है?
इसी समय नहाने की
गंगा तो गंगा ही रहेगी
कभी भी नहाया जा सकता है
फिर अभी ही क्यों?
लेकिन
चाह कर भी कुछ नहीं लिख पाया
क्योंकि एक तरफ मैं था
और दूसरी तरफ करोड़ों आस्थाएँ
मैं एक हूँ
सही भी हो सकता हूँ, ग़लत भी
वे करोड़ों हैं
सही भी हो सकते हैं ग़लत भी
मगर औसत आँकड़ा उनके ही पक्ष में था
और मैं कुछ न लिख सका