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भारत-जापान सांस्कृतिक संघ, टोकिया (जापान) के भवन के बाहर नव
वसन्तागम की दोपहरी में फूलते जापान के सुकुमार सांस्कृतिक पुष्प
साकुरा के वृक्षों को देखकर।
आधी रात के सुप्त अँधेरे सन्नाटे में
जिसके हिरोशिमा, नागासाकी-
किये गये हैं दस्यु, मृत्युवाही बमों से ध्वस्त;
जिसका मन है, आज तक-
हरे-कच्चे अंगूरों जैसे अनरिसे घावों की पीड़ा से संत्रस्त;
हर लिया गया है यों-
जिसकी आत्मा का उल्लास,
वहीं संन्यस्त-मन तो हँस सकता है-
आबदार मोतियों का हास;-
लेते हुए धीमी, मौन, गहरी, करुण, टकराती निःश्वास!
समुद्र की लहरों के करुण, रोर में,
करुण स्मृतियों से,
रहते हैं गीले जिसके अधमुँदे नैन-
वही तो बोल सकता है,
अभिताभ का अनुयायी,
आत्मा की कराहमयी भाषा में,
साकुरा के पुष्पों के रूप में-
नीरव, मित,
माखन-जैसे, मृदु-स्निग्ध बैन!