भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सलि पिरीली / मीरा हिंगोराणी

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 20:21, 1 फ़रवरी 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मीरा हिंगोराणी |अनुवादक= |संग्रह=...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

छो चवनि सूरज खे ॾाॾो,
चवनि चंड खे मामो,
सलि तूं हीअ पिरोली,
मुहिंजी मिट्ठड़ी अम्मां।

ॾे थो चंडु असां खे थाघलि,
खूब मीहुं वसाइिन बादल,
तपी गुस्से में थे सिजु लाल,
सलि तूं हीअ पिरोली अम्मां...

झले हथ में जादूअ प्यालो,
करे थी कुदरत जी तमाशो,
ॻालिह समझ खां बाहिर अम्मां।
सलि तूं हीअ पिरोली अम्मां...