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तीस्ता सीतलवाड के लिए / देवेन्द्र आर्य

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क़ीमत फिर भी बड़ी चीज़ है
हमा-शुमाँ के लहजे को
मामूली अनुदान बदल के रख देता है।

सपनों में आया हलका सा परिवर्तन
भीतर से इंसान बदल के रख देता है।

रिंग जा रही होती है
लेकिन रिस्पांस नहीं होता है
हो निर्वात तो सम्वादों का कोई चांस नहीं होता है
किसी देश के किसी काल के किसी भी गांधी को देखो तुम
डेढ़ हड्डियों पर एक गाल बराबर माँस नहीं होता है

एक कबीर का होना
वेद पुराणों से अर्जित सारा ग्यान
बदल के रख देता है।

जब भी कोई
सच में फिनिशिंग टच पैदा करने लगता है
सच का देशज औषद्यीय गुण भीतर से मरने लगता है
सच की सत्ता पर काबिज़ होके सूरज बनने वाला
सच की खाद-मिलावट की सच्चाई से डरने लगता है

सच में झूठ का हल्का-सा भी खारापन
लोगों के दिल में उपजा सम्मान
बदल के रख देता है।

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