भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
हँसी / कुंदन सिद्धार्थ
Kavita Kosh से
बहुत कुछ कहती है
भरोसा जगाती हँसी
एक बेपरवाह हँसी गढ़ती है
सुंदरता का श्रेष्ठतम प्रतिमान
अर्थ खो देंगे
रँग, फूल, तितली और चिड़िया
एक हँसी न हो तो
हँसी से ही
सम्बंधों में रहती है गर्मी
नींद कैसे आयेगी हँसी के बिना
प्रेम का क्या होगा?
हँसी को तकिया बनाकर
सोता है प्रेम