Last modified on 24 फ़रवरी 2012, at 11:58

रिमझिम के फूल झरे / सोम ठाकुर

Dkspoet (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 11:58, 24 फ़रवरी 2012 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सोम ठाकुर |संग्रह= }} {{KKCatGeet}} <poem> रिमझिम ...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

रिमझिम के फूल झरे रात से
बूँदों के गुच्छे मारे मेघा

कल तक देखे है हर खेत ने
अनभीगे वे दिन मन मारकर
बिन बात अम्मा भी खुश हुई
हल- बैलों की नज़र उतारकर
उमस --उमस उमर -क़ैद काटकर
जाने क्या सगुन विचारे मेघा

पहली बौछारों -भीगी धरा
दाह बुझा नदिया की देह का
घुल-घुलकर धार -धार नीर में
मुँह मोड़े खारापन रेह का
चमक उठी आकाशें जो स्वयं
बिजली के रूप संवारे मेघा

लहराई जल- झालर इस तरह
रात- रात झूलों के नाम है
घिरकर घहराई जो घन -घटा
लगता दिन -दुपहर ही शाम है

दिशा -दिशा झूमझूम -झूमझूम
सागर का क़र्ज़ उतारे मेघा

क्षितिजों तक इंद्र -धनु तना कभी
उभरे है कभी स्वर्ण चित्र सा
बार-बार किरण -घुले रंग में
महके कुछ मौसम के इत्र -सा
खोजे जाने किस को जन्म से
जाने क्या नाम पुकारे मेघा?
बूँदों के गुच्छे मारे मेघा