भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

देखत कै वृच्छन में / गँग

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:50, 22 सितम्बर 2012 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गँग }} Category:पद <poeM> देखत कै वृच्छन मे...' के साथ नया पन्ना बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

देखत कै वृच्छन में दीरघ सुभायमान,
          कीर चल्यो चाखिबे को प्रेम जिय जग्यो है.
लाल फल देखि कै जटान मँड़रान लागे,
          देखत बटोही बहुतेरे डगमग्यो है.
गंग कवि फल फूटे भुआ उधिराने लखि,
          सबही निरास ह्वै कै निज गृह भग्यो है.
ऐसो फलहीन वृच्छ बसुधा में भयो, यारो,
          सेंमर बिसासी बहुतेरन को ठग्यो है.