Last modified on 14 नवम्बर 2007, at 00:38

गाओ / त्रिलोचन

Pratishtha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 00:38, 14 नवम्बर 2007 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=त्रिलोचन }} मेरे उर के तार बजा कर जब जी चाहा<br> तुम ने गाय...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

मेरे उर के तार बजा कर जब जी चाहा
तुम ने गाया गीत। मौन मैं सुनने वाला
कृपापात्र हूँ सदा तुम्हारा, चुनने वाला
स्वर-सुमनों का। भीड़ भरा है, जो चौराहा

दुनिया का, उस में केवल अस्फुट कोलाहल
सुन पड़ता है। किस को है अवकाश, तुम्हारा
गान सुने, बदले अपने जीवन की धारा
अमृत-स्रोत की ओर। आह, भीषण हालाहल

समा गया है साँस साँस में घृणा-द्वेष का।
देख रहा हूँ व्यक्ति-समाज-राष्ट्र की घातें
एक दूसरे पर कठोरता, थोथी बातें
संधि-शांति की। विजय है दल दंभ-त्वेष का।

गाओ, मन के तारों पर, जी भर कर गाओ
जहाँ मरण का सन्नाटा है जीवन लाओ।