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सोता चरागाह / सुभाष काक

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दोपहर की
तपतपाती धूप में,
सोते चरागाह में,
जन्तु
पेड की छाया में
फैले हुए थे,
मधुमक्खियां ही
तल्लीन थीं
फूलों के ऊपर।

सामान्यता का रेशमी आवरण
ढके था
इन्द्रियों को
भ्रमों से।

उस तपन में
चाह उठी
निशब्दता की
पत्थरों की
बिन कहानी
जो बतायेंगे
धरा में
कितनी गर्मी है।

उस फटे आकाश में
न मृत्यु थी
न पानी
घर से पहुंचकर
दूर
एक आलोक में थे
जहां से वापस निकलकर
आना मना है।