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रपट लिखवाण थाणे म्हं / रामफल सिंह 'जख्मी'

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रपट लिखवाण थाणे म्हं, के सोच कै आई तू
पंच तो परमेश्वर हों सै, क्यूं बांधै गेल बुराई तू
 
खाप की तो राज म्हं चालै, नहीं जाणती बातां नै
मेरी भी ये बदली करवा दें, कौण सहै इन खापां नै
इन की मार घणी बुरी, तू उघाड़ देख ले गातां नै
कौण रोकेगा तू बता, फेर बिना भीत की छातां नै
चौधर गेल्यां टक्कर ले, क्यूं इतना गिरकाई तू
 
ऊपर तक सै डर इन का, या इसी पंचात सैं
अफसर-नेता सब की डोर, इन लोगों के हाथ सैं
पत्ता ना हाल्लै इन बिना, मेरी के बिसात सै
इन की गेल्यां टक्कर ले, तेरी औरत जात सै
घर आगै आपणे हाथों, खोद रही सै खाई तू
 
गुस्से म्हं तनै ठा ली, नाश की टाटी सिर पै
औटण का ब्यौंत नहीं, सब मिठ्ठी-खाटी सिर पै
खाप पंचातां की आवै, कल तेरे लाठी सिर पै
मौत घालैगी आज या कल, तेरे काठी सिर पै
पुलिस भी थारे जिसी सै, बहुत मनै समझाई तू
 
पंचात गेल्यां खामखा तू, पंगा लेवै हे छोरी
ब्याह तो आखिर करवाणा, क्यूं मरण नै हो री
‘जख्मी’ भी तेरे संग दीखै, ठा हिम्मत की बोरी
मैं तो रपट लिख ल्यूंगा, क्यूं कर री सीना जोरी
ऊतां का ईलाज करण नै, के ले री बता दवाई तू