भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
शब्द जल जाएँगे हवाओं से / जगदीश पंकज
Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 23:51, 14 सितम्बर 2014 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=जगदीश पंकज |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCatNav...' के साथ नया पन्ना बनाया)
शब्द जल जाएँगे हवाओं से
आप गुज़रेंगे बस तनावों से
मैं फ़कत आईना दिखाता हूँ
ख़ुद को ख़ुद पूछिए अदाओं से
आपकी चीख़ शोर में गुम है
लोग चिपके हैं अपने घावों से
यह महज इत्तिफ़ाक ही होगा
खड़े होगे जो अपने पावों से
खंजरों से तो बच भी जाओगे
बचना मुश्किल है इन अदाओं से
आग बाहर हो या कि भीतर हो
हम सभी घिर गए शुआओं से