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ज़माने ने मारे जवां कैसे-कैसे / कांतिमोहन 'सोज़'
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'ज़माने ने मारे जवां कैसे-कैसे ।
ज़मीं खा गई आसमां कैसे-कैसे ।।'
न कोई शजर है न कोई समर है,
चमन को मिले बाग़बां कैसे-कैसे ।
गदा बन गए हाकिमे-वक़्त बीसों,
सिकन्दर बने नातवां कैसे-कैसे ।
तवारीख़ है कुछ बयाबां नहीं है,
यहाँ दफ़्न हैं कारवां कैसे-कैसे ।
जो अदना हैं उनका करिश्मा तो देखो,
नुमायां हैं कारे-जहां कैसे-कैसे ।
न रोटी की क़िल्लत न महलों के सपने,
हुए फिर भी सूदो-ज़ियां कैसे-कैसे ।
न वो हमको समझे न हम उनको जाने,
हमें भी मिले हमज़बां कैसे-कैसे ।।