वगुला बैसकमे / चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

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बगुला बैसकमे बिनु गेलेँ

बगुला बैसकमे बिनु गेलेँ
जीवनकेँ सफल कोना कहतै’
ककरो क्यो सफल कोना कहतै’।

इच्छा हो यदि जीबैत रही,
कै´्चोभरि मधु पीबैत रही,
फटलो-पुरान खद्धड़क प्योन-
पर प्योन ताकि सीबैत रही,
टोपक बहु टोपी बिनु लेलेँ
गर्दनिकेँ फँसल कोना कहतै’
ककरो क्यो सफल कोना कहतैं’।

घूमू किछु दिन अपनहुँ जा कय
सत्ताधारीक महल्लामे,
देखब ढाबुस कोंकिआय रहल
ढोंढ़क अति लघु मृदु कल्लामे,
उचङब अलगट्टे बिनु सिखने
छोआ-मधुधार कोना बहतै’
ककरो क्यो सफल कोना कहते’।

मुखड़ा हो फूटल ढोल, मुदा
बाजू मिसरी सन बोल अहाँ
पिछड़ैत रहय यदि पैर पाछु
मानू दुनि´ाकेँ गोल अहाँ,
घड़सूड़क मैल बिना छुटने
क्यो ‘ऐश’क भार कोना सहतै’।
ककरो क्यो सफल कोना कहतै’।

चारू कछेड़ समगदेँ छै’
इँचना-पोठी से छै’ अमार,
ककरा बखरामे की पड़तै’
नहि सभक एकरङ छै’ कपार,
कबुला-पाती किछु बिनु कयने
गैँचीक सुतार कोना लहतै’।
ककरो क्यो सफल कोना कहते’।

साधना-निरत, इष्टक ऊपर
युग-युगसँ ध्यान लगौने जे,
ई धवल-वसन-बगुलाक पंक्ति
आशा लय अलख जगौने जे,
डिहवारक खूर बिना पुजने
पीड़ाक पहाड़ कोना ढहतै’।
ककरो क्यो सफल कोना कहतै’।

ककरो उपवन छै’ मजरि रहल
अनके रक्तेँ सब दिन सींचल,
ककरो अन्तर छै’ पजरि रहल
भूखल शिशु दिस मन छै’ खीचल,
बाजह नव-युगक विधातागण!
जग जाकय ककर चरण गहतै’।
ककरो क्यो सफल कोना कहतै’।

रचना काल 1950 ई.

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