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युग-नवीन / प्रतिपदा / सुरेन्द्र झा ‘सुमन’

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प्राचीन जीर्ण जगतीके बीनमे-बाजि रहल अछि युग नवीन
झड़ि रहल पुरातन पत्र - जाल, अंकु रित देखु नव-नव प्रवाल
पट पीत-धूसरित प्रकृति त्यागि, छथि पहिरि रहलि परिधान लाल
जगतीक पड़ल उद्यान जीर्ण-छथि आगत युग ऋतुपति नवीन।।1।।
भूगभेक सचित सोह सरल, शत-शत स्रोते उन्मुक्त तरक
अछि बहिर्भूत, कय जग चालित, बनि शक्तिक वाहन बेग प्रबल
चिर-रुद्ध प्रकृति भण्डार पीन, खुजि गेल युगक हाथेँ नवीन।।2।।
नभ-विद्युत भूतल उतरि चलक, वशवर्ती कयलक अनिल अनल
चंचला स्वयं छथि यन्त्र-बद्ध, ई नव विज्ञानक यन्त्र प्रबल
जगतक जड़ता चेतनाधीन अणु अणु जागुत जीवन नवीन।।3।।
नहि नाभिजन्महिक पùासन, नहि शिवक हाथ भीखक भाजन
इन्दिरा क्षीरनिधि कोस्तुभमणि, नहि जनादंनक हित संचित धन
सभ वस्तु विराअक रूप लीन, अन्तर्दर्शी युग-दृग नवीन।।4।।
ने सिन्धु लघ्य मारुति मायक, ने पुष्पक दशमुखहिक वाहक
पुनि मैथिलीक उद्धार हेतु ने राम बनथु, निधि पथ याचक
विज्ञान सेतु रचइत प्रवीन, त्रेता-जेता ई युग नवीन।।5।।
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ने विन्ध्य अगस्त्य मात्र लंघित, ने सिन्धु नलहि कर सँ बधित
ने शत योजन गति पवनसुतक, ने सुर मात्र क गति व्योम-पथक
ने गज-सहस्र बल वैयक्तिक ने सुधा गरल दल गत यौगिक
ने लकेशक गृह अग्नि-वायु, ने वर दानक बल स्ववश आयु
पार्थक शर वेधित भूमि - जलेँ, ने आइ भीष्म केर तृषा शमन
ने वाह्य शत्रु - आक्रमण-बलेँ, ककरहु सक पृथ्वीराज-दमन
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घर-घर छथि बद्ध पवन-बेगी, घर-घर प्रकाश रवि-शशि सेवी
घर-घर निर्झर मानव-वशमे, छथि बन्दी अनल-शलाकामे
नहि भेद आइ अछि कतहु रहल, बदलल अमाक रुचि राकामे
आयल अछि नव द्रष्टा प्रवीण, युग वर्तमान स्रष्टा नवीन
टूटल अछि क्षुद्र देश-सीमा, भूगोल बनल एके खीमा
अछि दिशा संकुचित गति-वेगेँ, पुनि काल सन्तुलित यन्त्र-बलेँ
परमाणु विभाजित अंश-अंश, नव - सर्जन मूलक ध्वंस-ध्वंस
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सहजहिँ अतीत टूटल सितार, जत युक्त वर्तमानहिक तार
प्राचीन जीर्ण जगतीक बीन-मे बाजि रहल अछि युग नवीन