भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

सिलसिला / असंगघोष

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 01:56, 10 अक्टूबर 2015 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=असंगघोष |अनुवादक= |संग्रह=खामोश न...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

क्योंकर लिखते हैं लोग
नारी के शृंगार पर
कल्पना के सागर में
गोते लगाते हुए
खोज लाते हैं,
तरह-तरह के अलंकरण,
रत्नाभूषण पहनाकर
शब्दों में बुन देते हैं
नारी का प्यार
भूल जाते हैं उसकी ममता
खो जाता है माँ का वात्सल्य
पीछे रह जाती है
बेबस मजबूरी
सामने रहता है वर्णन
नारी के अंग-प्रत्यंगों का
उनसे अछूती रह जाती हैं,
सिरबोझा ढोती
लकड़ी बेचकर पैसा पाने वाली
हाट बाजार करती
दलित मजदूरिन
जो मोल-भाव में कम पाती
क्रय करती अपनी आवश्यकता
ऊँचे भावों पर
दोनों ओर लुटी जाकर घर जाती
फिर अगला सप्ताह, अगला हाट
हर बार यही सिलसिला।