Last modified on 29 जून 2008, at 15:02

लाख गोहर फ़िशानियाँ होंगी / साग़र पालमपुरी

सम्यक (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:02, 29 जून 2008 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मनोहर 'साग़र' पालमपुरी }} Category:ग़ज़ल लाख गोहर फ़िशानिय...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

लाख गोहर फ़िशानियाँ होंगी

हम न होंगे कहानियाँ होंगी


कैसे पायेंगे हम पता अपना

ग़म की वो बेकरानियाँ होंगी


टूटे महराब गिरी दीवारें

मंदिरों की, निशानियाँ होंगी


अपना साया भी अजनबी होगा

वक़्त की ज़ुल्मरानियाँ होंगी


और होगा भी क्या महब्बत में

हाँ, मगर बदगुमानियाँ होंगी


आरज़ूओं की भीड़ में ‘साग़र’!

ज़ख़्म ख़ुर्दा जवानियाँ होंगी