भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
राखपत रखापत / मीठेश निर्मोही
Kavita Kosh से
आशिष पुरोहित (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:21, 1 अप्रैल 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=मीठेश निर्मोही |अनुवादक= |संग्र...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)
परभातै अर सिंझ्या
थारी सेवा करां
थनै मनावण
झालर-नगाड़ा बजाय
संख पूरां।
थारै न्हावण सारू
दिनूंगै ई
अबोट पांणी री
जळेरी भरां।
धूंपेड़ै धूंपिया धरां
अर
थनै खेवां
गूगळ धूंप
पण
म्हे भूखां मरां!
अे गिगन रा वासी
म्हांरै खातर ई औ
कदै ई कीं बजाव
म्हांनै ई रमाव।