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जब से तुम तारों में आए / रामगोपाल 'रुद्र'
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बादल ही रहते हैं छाए!
मैं रूप निहारूँ, तो कैसे?
जिनमें मोती भर आते हैं,
वे सीप स्वयं मुँद जाते हैं;
मेरे तो बन्दी बिन्दु तुम्हीं,
बन्धन भी मेरे, सिन्धु तुम्हीं!
मैं आँख उघारूँ, तो कैसे?
आकाश खुला मिल जाता है,
तो क्या-क्या गुल खिल जाता है!
तुमने जो आँज दिये लोचन,
उड़ना भी भूल गए खंजन!
मैं पाँख पसारूँ, तो कैसे?
लहरों के चित्र, पवन-प्रेरित,
हो जाते हैं तट पर अंकित;
पर मैं, जिसमें तुम काँप रहे,
तटहीन बनाकर भाँप रहे!
यह चित्र उतारूँ, तो कैसे?