भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

धैर्य-सागर / बलदेव वंशी

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 14:47, 13 नवम्बर 2008 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार= बलदेव वंशी |संग्रह= }} <Poem> घोर घावों-से फटे अभावों...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

घोर घावों-से फटे अभावों में भी
उत्सवी भवों को
जीने का मछुआरा स्व-भाव !
यही है तुम्हरा कमाल दुस्साहसी
जो तुमने क्षण-क्षण सिखलाया

नहीं तो
सागर-पुत्र ये मछुआरे
अपनी फटी कथरियों में
धैर्य (तटों) से (बंधे)
इतने मालामाल न होते !
कि लोग उनके सामने
उनके रक्त के कुल्ले करते
अपने हाथ-पाँव धोते
और वे सिर्फ़
टुकुर-टुकुर देखते होते !