Last modified on 11 अक्टूबर 2009, at 10:38

दो अर्थ का भय / गिरिराज किराडू

अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 10:38, 11 अक्टूबर 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गिरिराज किराडू }} {{KKCatKavita‎}} <poem> अपमान बेहद था होने क…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

अपमान बेहद था होने का रक्त के दरिया में दौड़ते घुड़सवार थे किसी और से नहीं
अपने आप से थी शर्मिंदगी हर साँस में हर शब्द का एक अर्थ दुख दूसरा मज़ाक था – जीवन में
कल्पना में पर नहीं था इनमें से कुछ भी
यही मेरा गुनाह कल्पना में सुखी था मैं