Last modified on 2 सितम्बर 2010, at 15:10

हाउ पानिक पिन / गिरीश चंद्र तिबाडी 'गिर्दा'

अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 15:10, 2 सितम्बर 2010 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=गिरीश चंद्र तिबाडी 'गिर्दा' |संग्रह= }}‎ [[Category:कुमा…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

सोचि ल्यूछा त सोच पड़नी, कौ भे मी, का बटी ऐ
रूडीनिक जसी बरख सुदे, अरख, बरख, काँ हु गे !
और उसिक सोचि ल्यूछा त, मई लिहबहर दुनी भे,!
सूरज में उजियाव भे म्यर, जौडनी में रौशनी भे, !
और उसिक औकात कूछा, तीन में न तेर में,
द्वि सोरा मुरलिक सर, भ्यार में न भीटर में!
जानी कभत फ्यासस करी दियो, हाउ की त जात भे!
यो जौलिया मुरुलिक और चलण तककी बात भे !
पर जतुक भे, जे ले भे, यो सब तेरी करामात भे!
वो रे हाउ पानिक पिना. तेरो ले बात भे!
सोचि ल्यूछा त सोच पड़नी !