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चांदनी रात है / राजकिशोर सिंह

दिन उजला चांदनी रात है
मन में गम आँऽों में बरसात है

किसको-किसको कहूँ यह किस्सा
सुनने वाले हैं सब कोई न साथ है

जाते हैं गिर पिफसलकर जब कभी
पता चलता है अपनों का हाथ है

सुबह जो बोले साँझ नकारे
बड़े लोगों की यही तो बात है

लोग मुझपे क्यों लगे हुए हैं
उनसे जब न दर्शन न मुलाकात है।